सफरनामा

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~मेघा कौशिक आंखो में सपने सजाए ऐसेआसमां पर पांव हो जैसेयूं चलाई कलम इस कदरदिन और रात एक हो जैसेजूते पहन फिर भी कटे पांवराहों में कांच के टुकड़े हो जैसेऔर मंज़िल मिलते हीकमबख्त दनिुया बोले -खुशकिस्मत हैं आपहमारा सफर आसान था जैसे।